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किताबें

बूढी़ हो चुकी हैं किताबें ये जिल्द पर भी धूल जम चुके, सोचती हूँ तख्त से इन्हें उतारूँ, और वहाँ कुछ नया सजाऊँ, अब इन किताबों के शब्द और वाक्य, मेरे किस काम के बदलते जमाने के नये-पुराने वक्त की तरह।।