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Showing posts from May, 2024

केशव प्रसाद मिश्र के लेखन में जीवित परम्पराएं

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  कोहबर की शर्त से आंचलिक लेखन में ख्याति प्राप्त करने वाले बलिया उत्तर प्रदेश के केशव प्रसाद मिश्र के साहित्यिक अवदान उच्च कोटि का है।केशव प्रसाद मिश्र ने न सिर्फ़ कोहबर की शर्त लिखी बल्कि और भी कई उपन्यास लिखें हैं जिनमें - काली दीवार, क्या रोशनी मौत है, गंगाजल, महुआ और साँप, देहरी के आर-पार, उस रात के बाद,समुहूत (कहानी संग्रह) कोयला भई न राख (कहानी संग्रह)। केशव जी के उपन्यासों में भारतीय ग्रामीण परम्पराओं का वर्णन बड़े ही स्वाभाविक रुप में किया गया है। कोहबर की शर्त तो खेती और प्रीति का भरपूर लेखा-जोखा है। इसमें जब काका के बीमार पड़ने पर वैद्य जी को बुलाया जाता है तो वैद्य जी अपना उपचार एकदम घरेलु नुस्खे और जड़ी-बूटीयों से करते हैं। जैसा कि पूर्व समय में आयुर्वेदिक तरीके से उपचार किया जाता था।  केशव जी के साहित्य में अगर खेती की बात की जाए तो सभी किसान जब अनाज की बोआई करते हैं तब फसल तैयार होकर कटने के बाद खलिहान में दवरी के लिए रखी जाती है। उस वक्त फसल पर कई संकट मंडराते हैं जैसे जब तक धान की फसल को पीटकर अनाज इकट्ठा ना हो जाए तो आग लगने का डर बना रहता है…. बिल्कुल गेहूँ...

बलिया को नदिया पार कराने वाले केशव प्रसाद मिश्र

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  विवाह में अकसर बजने वाले गीत जब तक पूरे ना हो फेरे सात.... एवं आज भी होली में 'जोगी जी धीरे-धीरे... बिना इन गीतों के बिना जैसे सूना सा लगता है। जबकि सच्चाई भी यही है कि 'नदिया के पार' के ये गीत ही लोगों के दिलों पर राज नहीं करते, इस फ़िल्म को आज भी दिल से सराहा जाता है। भले ही यह फ़िल्म केशव प्रसाद मिश्र द्वारा लिखित उपन्यास 'कोहबर की शर्त' की आधी कहानी है लेकिन यह भी सोचने योग्य है कि आधी कहानी जब इतनी प्रसिद्ध हो सकती है तो पूरी कहानी क्या बयां करती। केशव प्रसाद मिश्र का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले बलिहार गाँव में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा भी बलिया जिले में ही हुई। उच्च शिक्षा के लिए जब केशव जी ने प्रयागराज के लिए कूच किया तभी से उनका रुझान हिंदी साहित्य की तरफ़ होने लगा था। वरना कहाँ अर्थशास्त्र का छात्र साहित्य की इतनी बारिकीयों को संजीदगी से सबके सामने ला पाते ये वह स्वयं भी नहीं समझ पाए होंगे। पूर्वांचल के रहन-सहन का शुरू से ही अपनी एक पहचान रही है। चाहे वो फूटेहरी-चोखा हो या होली के पकवान पुआ सबकी अपनी खासियत आज तक बरकरार रही है। इसलिए जब नदिया के पार ...

जन्मभूमि

 ढूंढ़ रही खुद को अपने ही आंगन में बचपन की गलियां औधे पड़े सूखे पड़े आम अमरुद के पेड़ जैसे पूछते औ तंज कसते आ गई तुमको याद कहो कैसे? जिस आंगन में चहकते थे सब खेल-खेल में हँस-हँसकर लोट जाते थे भूईं पर अब वो तिलमिला सा गया आगमन पे मेरे एक अरसे पर.. फूलों की जिस ख़ुशबू से महकता था दूर-दूर तक घर-आंगन अब वो धरती घास-फूस सी है बंजर क्या जवाब दूँ मैं इनको.. कहाँ चाहते थे हम कि हमारा बचपन यूँ हो जर्ज़र हे मातृभूमि! जिससे थी रौनक तेरी वो ही नहीं अब.. कर माफ़ मुझे तेरी उदासी नहीं लौटा सकती तेरी तरह ही मैं भी हूँ बेबस..।

चादर के गुदली सी सिमटी औरत

 चादर के गुदली में  सिमटी औरत  खुद के लिए भी  कभी जीती है क्या ?  सुबह की अलसायी आँखे  रात के बिखरे गृहस्थी से शुरू होती है  व्यंजनों को दिल से पकाती  सबसे अंत में खाती  चादर के गुदली में  सिमटी औरत...  उस घर को सवाँरती  जिस घर में उसका अस्तित्व ही नहीं  फिर भी मुस्कुराती  जननी कहलाकर ही सुख पाती  चादर के गुदली में  सिमटी औरत...  बचपन जहाँ बीता  वो भी अपना नहीं सका जिसे  जहाँ सारी जिंदगी निसार दी  सजाते, सवाँरते  वहाँ यहीं सुना करती क्या हो  चादर के गुदली में.  सिमटी औरत...  डोली मायके से और  अर्थी ससुराल से उठे  इसी भ्रम में  पति और बच्चों के लिए  उपवास रखती है  सबको हरा - भरा कर  खुद को खोखला करती है  चादर के गुदली में  सिमटी औरत  खुद के लिए भी  कभी जीती है क्या ?