केशव प्रसाद मिश्र के लेखन में जीवित परम्पराएं
कोहबर की शर्त से आंचलिक लेखन में ख्याति प्राप्त करने वाले बलिया उत्तर प्रदेश के केशव प्रसाद मिश्र के साहित्यिक अवदान उच्च कोटि का है।केशव प्रसाद मिश्र ने न सिर्फ़ कोहबर की शर्त लिखी बल्कि और भी कई उपन्यास लिखें हैं जिनमें - काली दीवार, क्या रोशनी मौत है, गंगाजल, महुआ और साँप, देहरी के आर-पार, उस रात के बाद,समुहूत (कहानी संग्रह) कोयला भई न राख (कहानी संग्रह)। केशव जी के उपन्यासों में भारतीय ग्रामीण परम्पराओं का वर्णन बड़े ही स्वाभाविक रुप में किया गया है। कोहबर की शर्त तो खेती और प्रीति का भरपूर लेखा-जोखा है। इसमें जब काका के बीमार पड़ने पर वैद्य जी को बुलाया जाता है तो वैद्य जी अपना उपचार एकदम घरेलु नुस्खे और जड़ी-बूटीयों से करते हैं। जैसा कि पूर्व समय में आयुर्वेदिक तरीके से उपचार किया जाता था। केशव जी के साहित्य में अगर खेती की बात की जाए तो सभी किसान जब अनाज की बोआई करते हैं तब फसल तैयार होकर कटने के बाद खलिहान में दवरी के लिए रखी जाती है। उस वक्त फसल पर कई संकट मंडराते हैं जैसे जब तक धान की फसल को पीटकर अनाज इकट्ठा ना हो जाए तो आग लगने का डर बना रहता है…. बिल्कुल गेहूँ...