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Showing posts from May, 2018

पथ

साल दर साल बीत गए मन फिर भी खडा वहीं उदास जाने कितनी सावन की घटाएँ आई मेघ भी बरसे फिर भी खाली रहे सदा मेरे हाथ सोचती निरन्तर चलती भी पथ पर कोई तो हो जो देता साथ कली फूल बने पौधें वृक्ष बने बस जलता रहा अकेला धरती पर बूढ़ा घास नित्य बढते रहे सब नये शिखर पर बस ढूंढती रही मै खुद को करती रही खुद से ही परिहास।।

दहेज की चिता

वो जल रही थी तडप-तडपकर धूँ-धूँ कर धुआं उठ रहा था उसके अंगताप से। जलती रही वह तिल-तिलकर नित्य के अत्याचार से। बहुत रोई वह हाथ जोड़ गिडगिडाई भी, पर किसी तक ना पहुंची उसके रुदन की आवाज कुछ भी ना शेष रहा जलकर हो गया सब राख। शेष थीं तो बस उसकी अस्थियाँ कराने को सबको पश्चाताप। क्या बेटी होना अपराध था उसका ? जो उसे जला दिया। कौन बचायेगा इन बेटियों का अस्तित्व ? कौन सम्भालेगा मोर्चा दहेज के खिलाफ।।

अंधा मजहब

मजहब के नाम पर मरने-मिटने वालों, पहले यह तय करो,आज तुम रहीम हो तो कल तुम्हारा नाम राम न होगा। मजहब के नाम पर हिंसा फैलाने वालों, पहले यह तय करो, आज जो मस्जिद खुदा का घर है तुम्हारा, कल तुम्हारा सिर किसी मंदिर में न झुकेगा । मजहब के नाम पर मासूम जिंदगियों की बलि चढाने वालों पहले यह तय करो, जिस जुबान से आज तुम कुरान-ए-शरीफ की नज्में पढते हो कल उस जुबान पर गीता का श्लोक न होगा। मजहब की आड़ में अपनी ही जमीं का सौदा करने वालों पहले यह तय करो, आज जिस मुस्लिम का घर आशियाना है तुम्हारा कल फिर तुम्हारा जन्म हिंदू के घर न होगा।।

फिरकीपरस्त जेहादी

सरहद के उस पार रहने वालों अमन की राह तुमको क्यों नही भाति ? क्या रखा है इस जेहाद में गौरतलब है इंसानी जज्बातें। धर्म तो नाम है, एक खूबसूरत एहसास का, जो ऊपरवाले की इबादत में झुके। यह हाथ आगे बढे किसी मजबूर, बेसहारा को थामने को क्यों यह किसी के मौत का फरमान बने? बडी ही मशक्कत से मिलता है यह मानव जीवन इसे ऊपरवाले की सेवा में दान करें। क्या लडना इस दो गज जमीन की खातिर, मर जाओगे तो यह भी नसीब न होगी दफनाने को। मानो तो यह जमीन हम सबकी है, न मानो तो किसी की नही, बस सोचने का अपना-अपना जज्बा है। इसीलिए कहते है हम, आओ दोस्ती की रस्म अदा करें, धर्मयुद्ध नही, दिलों में मुहब्बत के जज्बात पैदा करें।।

धर्म क्या है ?

धर्म क्या है ? ईश्वर की वन्दना पूजा या अर्चना या फिर वेदों की उद्घोषणा, नहीं यह धर्म नही। धर्म है एक सामाजिक प्राणी का दूसरे मनुष्य के प्रति, धर्म किसी के स्वयं की पहचान नहीं धर्म कर्तव्य है एक भूखे मनुष्य को भोजन कराना, धर्म है एक निर्वस्त्र को वस्त्र धारण कराना, धर्म वेदों की उद्घोषणा नही धर्म है,कर्तव्यों का निर्वाह, धर्म है आचार धर्म है हमारे विचार। धर्म का अर्थ किसी मनुष्य पर थोपना नही है धर्म है इक आस्था जो किसी के भी प्रति हो सकती है चाहे वह पत्थर से निर्मित कोई आकृति हो या फिर चाहे, हमारे मन के अंदर छिपी एक कल्पना। बस अन्तर है हमारी सोच का। कोई गीता को धर्म मानता है तो कोई बाइबिल, कुरान को। कोई भगवान को पूजता है तो कोई इंसान को, पर, वास्तविक धर्म तो पर्याय है, कर्म का।।

बचपन

ऐ नादान बचपन! आ चल फिर लौट चले, बचपन के गलियारे में। थक गई हूँ, समझदारी की दुनिया से। उलझ गई नाते-रिश्तेदारों के जमाने में। अठखेलियां करना चाहतीं, फिर से सखी सहेलियों संग ट्यूबवेल के पनियारे में। कहा मजा अब वो खरीद कर खाने में, जो मजा आता था दक्षिण के बगीचे से, मित्रों संग जामुन-आम चुराने में। आह! कितना आनंद था, नासमझी के जमाने में। जगह जगह से ईंटों को चुराना, गुड्डे गुडियों का घर बनाना, अब कहा वो मजा है खुद का घर सजाने में।।

विशाल तरु

जन्म हुआ जब उसका फूटी कुछ कोंपलें। कोपलों से जन्मी कुछ उमंगे, धारण किया जिसनें तने का रूप। वह सोच रहा था, होगा वह और बडा और बडा। मन ही मन सोचा था उसने, होगा वह विशाल तरु। उष्णता के प्रकोप से, सींचता हजारों को, शीतल छाया देता। लेकिन कुछ लोगों ने, क्षणिक स्वार्थ सिद्धि के लिये, काट लिए उसके कुछ तने। मौन दुखित हो रहा था, कर रहा था, अपनी चोट का एहसास। फिर सोचा भला, मै क्यों होऊं दुखी? मुझमें तो है प्रकृति प्रदत्त, अनवरत विशाल होने की प्रवृति। मै क्यों होऊं किसी से नाराज? मुझमें तो है सहने की क्षमता, हिमपात और बज्रपात का भी प्रहार।।