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Showing posts from July, 2018

मायका

नस नस में रचा बसा हंसता गुदगुदाता आनंदित करता पल पल की याद दिलाता। खट्टे मीठे नोक झोंक आज होंठों पर मुस्कान है लाता। आंगन की सौंधी-सौंधी महक माँ के हाथ की खुशबू और रसोई की बघार भूख से बेबस कर जाता। आज भी सपने में मायके का वहीं बिछौना दिल को बडा तडपाता। ममता की चौकट लांघ ससुराल के द्वार तक आना याद बहुत आता है मुझको मेरे मायके का वह गुजरा जमाना।।

आंधी

सोचती थी सारी दुनिया है मेरे पास फिर क्या डरना और किसी से उडते फिरते थे हम चहचहाते सारी रात यूहीं गुजर रहा था सफर हंसते गाते साथ साथ अचानक एक आंधी आई उडा ले गई सब अपने साथ पत्ते तो पत्ते डाल का भी पता न चला होश आया तो विरान सी दुनिया और सन्नाटे थे आस पास लेटी गिनती रही बंजर जमीन, सूनी बस्ती निहारती अधमरी सांसो के साथ शून्य सी ठहरी निहारती खामोश नजरें इधर उधर भटकती रंगों से भी अब डरती हाय अधूरी रह गई आज।।

मै क्या हूँ ?

मै क्या हूँ ? मोहन की बंसी या फिर श्याम की राधा या फिर तपते मरूस्थल में पीपल की ठंडी छाँव। मै क्या हूँ ? तुम्हारे प्रेम की नैया या फिर हूँ पतवार या फिर तुम्हारे मन का आधार या फिर हूँ निराकार। मै क्या हूँ ? फूलों की खुशबू या फिर कांटों की चुभन या फिर हूँ तुम्हारे गले का हार ।।

झिलमिलाते झरने

गागर में सागर सी बूंदें तेरी हिमशिखाओं से पिघलकर खुलते झरनों के द्वार। मदहोश करते सबको तेरी अनुपम छटाएं दिल होता बाग बाग। ऊंंचाई इतनी तेरी कि नाप नही सकते बस दो नैनो से ताकती तेरी सुंदरता अपार। झिलमिलाते चाँदी से हरे भरे पन्ने दिल चाहता लिखूं बार बार।।