मृत्यु रे ! चंचल मन,कर ले थोडा विराम् थक गया होगा तू भी, कर ले आराम्। फिर सोच जरा, स्थिर भाव से, धर्म क्या, अधर्म क्या? सत्य क्या, असत्य क्या ? है एक कटुवचन, क्या अहं करना इस तन पर मिट्टी से बना जो फिर एक दिन मिट्टी में हैं मिल जाना। मौत है एक सच्चाई हर दिन होती जिसकी विदाई।।
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खामोश परछाई तन्हा थी तब भी,तन्हा हूँ अब भी बस मैं हूँ और ये बेजुबान दिवारें साथी हैं ये खिडकियां और दरवाज़े। जिन्हें चारदिवारों में बन्द कर रखा है मैंने न कोई रोशनी आ सके इस बेरंग कमरे मेंं। कुछ बारिश की बूंदें आती हैं, सर्द हवाओं के साथ। पर पत्थर से बने खिडक़ी और दरवाजों से, वापस लौट जाती हैं टकराकर। डरती हूँ इन्हें खोलने से, जिनके एहसासों से जन्मेंगी कुछ उमंगें कुछ तरंगें। जिन्हें पाने के लिए चारदिवारी से बाहर निकलना पडेगा उजालों की दुनिया में, भागीदार बनना पडेगा स्वार्थी भीड़ का। जहाँ निजस्वार्थ की खातिर हर पल एक दूसरे को लूटते हैं लोग और कहते हैं हम बन्दे हैं अल्लाह के। क्यों जाऊँ ऐसी दुनिया में जहाँ रंगों की खातिर अपनी ही परछाईं से मुँह मोडते हैं लोग। इनसे अच्छी मेरे काले कमरे की तन्हाई जिसमें होती नही कोई परछाईं।।