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Showing posts from June, 2018

बहती नदी

बेशक तुम हो सागर मै हूँ एक बहती नदी। यह न भूलो तुम विशाल हो फिर भी मै हूँ सत्य और निष्ठा का प्रतीक। यह सच है तुम्हारे अंदर छिपी है मोतियों की खान लेकिन मै भी हूँ सम्पूर्ण जगत की मान। अहं न करो अपनी सत्ता पर ध्यान करो जरा मेरी भी महत्ता पर। बडे होकर भी न दे सके तुम किसी को प्राण लेकिन मेरी दो बूंदों ने ही दिया है जीवनदान। मेरी बूंद-बूंद से ही भरा है तू सागर भूला ना सकोगे तुम यह कभी चाहकर ।।

मान-मर्यादा

जिस देश की नदियांं बहती है गंगा-यमुना और सरस्वती के नाम पर फिर भी सदा प्रहार हुए इन्हीं के स्वाभिमान पर जहाँ गार्गी और विद्योत्तमा जैसी विदुषियां फिर भी उनका मार्ग अवरुद्ध होता मान-मर्यादा और चूल्हा चौका के नाम पर इतिहास में लक्ष्मीबाई भी युद्ध लडी अंग्रेजों से, पुत्र को पीठ पर बांध कर किंतु आज की स्त्री युद्ध करती हर पल कभी दहेज तो कभी घरेलू हिंसा के नाम पर ऐ अभिमानी, ना इठलाओ अपनी पुरुष प्रधान सत्ता पर आज की सीता धरती मे नही कल्पना से यथार्थ तक पहुंच चुकी है चांद पर।।

नीला आसमां

मौसम दर मौसम तुम्हारी विशिष्टता लुभाती प्रातःचमकीला नीला तो दोपहर हरित मणी रंग सा तू तो पूरे दिन रंग बदलता सूर्योदय में पीला, गुलाबी तो सूर्यास्त में चमकदार नारंगी तुम्हारा स्वभाव भी हम मनुष्यों सा बदलता गर्मी में खिली-खिली धूप तो बरसात में काले मेघ सा मल्हार गाता तेज धूप से थकता तो चांदनी रात में शीतलता छलकाता अनगिनत मंदाकिनियों में छुपा मंद-मंद मुस्काता ।।

चीरहरण

जन्म से अंधे थे धृतराष्ट्र पर श्रवण शक्ति थीं उनके पास किंतु भरी सभा में पंचाली को दाव पे लगाने वाले थे धर्मराज पुत्र मोह में भी अंधे थे धृतराष्ट्र पर राजा के कर्तव्य का भी किया तिरस्कार क्यों हुआ द्रौपदी का चीर-हरण ? कैसे हुआ था दुस्सासन का विकास ? कहते हैं दोषी थी स्वयं द्रौपदी दुर्योधन पर किया था अट्टहास कैसा है यह निर्लज्ज समाज ? सदियों से स्त्री के गर्भ में पलता और सदा स्त्री को ही कलुषित करता करता स्त्री पर ही अत्याचार छल तो हर युग में हुआ कभी सीता के साथ तो कभी द्रौपदी के साथ कलुषित होती रही स्त्रियां कभी धर्म के नाम पर कभी छोटे वस्त्र के नाम पर दुस्सासन और रावण तब भी थे और अब भी हैं सत्ता कैसी भी हो, कोई भी हो सत्ता से समाज का परिवर्तन नहीं सोचनीय हैं, स्त्रियों की असुरक्षित अस्मिता और मान-सम्मान।।

आकांक्षाओं का अंत

काश कि ऐसा न होता स्थिर, निर्विकार, भावशून्य बने धीरे-धीरे चिंता की अग्नि में होती जा रही विलीन। न कोई अतीत न भविष्य मात्र स्तब्धता और क्षणिक शांति बीच-बीच मे स्तब्धता को करूणामयी बना रहे उपस्थितियो के द्विभाषी आंसू उपस्थित परिवार, झूठी प्रतिष्ठा की जननी जो कर रहा था, मेरी आशाओं का अंत। उनके अफसोस और निराशा के संगम से उपजे दुर्लभ क्रोध की क्रियाएं जो प्रतीक थे उनके आतंक के निरन्तर प्रहार जारी था पत्थर बनने तक मेरे। चन्द क्षणों के विराम् और आंसूओं की धाराओं के बीच शून्य होती गई मेरी आकांक्षाएं उनके क्रोध भी थमते गये खूँ बनते गए आंसू अपनी निराशा पर अविश्वास की छाया देख सोचने लगे, होने लगे चिंतामग्न अपनी जिम्मेदारीयों के बोझ से कैसे परे हो उनके दामन कौन जानता था, किसकी जीत हुईं किसी की आशा मरी आशा की आत्मा बन गई निराशा लोग चलते बने मेरी सफलता को, असफलता की कुंजी मेरी लाश को दिए।।

सितमगर

उंगली मुझपर उठाने वाले इस शहर के अंदर कितने हैं। एक दो हो तो नाम बताऊँ ऐसे सितमगर अपने ही कितने हैं। कौन है, क्या है ये जान लिया है, लोगों को पहचान लिया है। वक्त को जब भी प्यास लगी मैंने अपनी आँखों का आँसू दिया है। जिस्म को खोल के देखो, मेरी आत्मा पर जाने नश्तर कितने है। साँसों की कश्ती डूब न जाये पतवार हाथ से छूट न जाये। आँखों की इस गहराई में जाने समन्दर कितने है। जहाँ प्यार से झुक जाये यही तो इक बात है। पर ताकत से झुक नहीं सकती ऐसे भी सिर कितने है। बेगानों की बात ही क्या अपनो की ही ये हालत है। सामने फूलों की डाली पीठ पीछे कांटों की चुभन कितने है। वक्त का साथी कौन बनेगा, हमदर्दी के नाम पर जख्म देने वाले लोग यहाँ कितने है।।