बहती नदी
बेशक तुम हो सागर मै हूँ एक बहती नदी। यह न भूलो तुम विशाल हो फिर भी मै हूँ सत्य और निष्ठा का प्रतीक। यह सच है तुम्हारे अंदर छिपी है मोतियों की खान लेकिन मै भी हूँ सम्पूर्ण जगत की मान। अहं न करो अपनी सत्ता पर ध्यान करो जरा मेरी भी महत्ता पर। बडे होकर भी न दे सके तुम किसी को प्राण लेकिन मेरी दो बूंदों ने ही दिया है जीवनदान। मेरी बूंद-बूंद से ही भरा है तू सागर भूला ना सकोगे तुम यह कभी चाहकर ।।