सितमगर

उंगली मुझपर उठाने वाले
इस शहर के अंदर कितने हैं।
एक दो हो तो नाम बताऊँ
ऐसे सितमगर अपने ही कितने हैं।
कौन है, क्या है ये जान लिया है,
लोगों को पहचान लिया है।
वक्त को जब भी प्यास लगी
मैंने अपनी आँखों का आँसू दिया है।
जिस्म को खोल के देखो,
मेरी आत्मा पर जाने नश्तर कितने है।
साँसों की कश्ती डूब न जाये
पतवार हाथ से छूट न जाये।
आँखों की इस गहराई में
जाने समन्दर कितने है।
जहाँ प्यार से झुक जाये
यही तो इक बात है।
पर ताकत से झुक नहीं सकती
ऐसे भी सिर कितने है।
बेगानों की बात ही क्या
अपनो की ही ये हालत है।
सामने फूलों की डाली
पीठ पीछे कांटों की चुभन कितने है।
वक्त का साथी कौन बनेगा,
हमदर्दी के नाम पर जख्म देने वाले
लोग यहाँ कितने है।।

Comments