आंधी

सोचती थी
सारी दुनिया है मेरे पास
फिर क्या डरना
और किसी से
उडते फिरते थे हम
चहचहाते सारी रात
यूहीं गुजर रहा था सफर
हंसते गाते साथ साथ
अचानक एक आंधी आई
उडा ले गई सब अपने साथ
पत्ते तो पत्ते
डाल का भी पता न चला
होश आया तो
विरान सी दुनिया और
सन्नाटे थे आस पास
लेटी गिनती रही
बंजर जमीन, सूनी बस्ती
निहारती अधमरी सांसो के साथ
शून्य सी ठहरी
निहारती खामोश नजरें
इधर उधर भटकती
रंगों से भी अब डरती
हाय अधूरी रह गई आज।।

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