जन्मभूमि

 ढूंढ़ रही खुद को

अपने ही आंगन में

बचपन की गलियां

औधे पड़े

सूखे पड़े आम अमरुद के पेड़

जैसे पूछते औ

तंज कसते

आ गई तुमको याद

कहो कैसे?

जिस आंगन में

चहकते थे सब

खेल-खेल में

हँस-हँसकर लोट जाते थे

भूईं पर

अब वो तिलमिला सा गया

आगमन पे मेरे

एक अरसे पर..

फूलों की जिस

ख़ुशबू से

महकता था दूर-दूर तक

घर-आंगन

अब वो धरती

घास-फूस सी है बंजर

क्या जवाब दूँ मैं इनको..

कहाँ चाहते थे हम

कि

हमारा बचपन यूँ हो जर्ज़र

हे मातृभूमि!

जिससे थी रौनक तेरी

वो ही नहीं अब..

कर माफ़ मुझे

तेरी उदासी नहीं लौटा सकती

तेरी तरह ही मैं भी हूँ बेबस..।

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