चादर के गुदली सी सिमटी औरत
चादर के गुदली में
सिमटी औरत
खुद के लिए भी
कभी जीती है क्या ?
सुबह की अलसायी आँखे
रात के बिखरे गृहस्थी से शुरू होती है
व्यंजनों को दिल से पकाती
सबसे अंत में खाती
चादर के गुदली में
सिमटी औरत...
उस घर को सवाँरती
जिस घर में उसका अस्तित्व ही नहीं
फिर भी मुस्कुराती
जननी कहलाकर ही सुख पाती
चादर के गुदली में
सिमटी औरत...
बचपन जहाँ बीता
वो भी अपना नहीं सका जिसे
जहाँ सारी जिंदगी निसार दी
सजाते, सवाँरते
वहाँ यहीं सुना करती क्या हो
चादर के गुदली में.
सिमटी औरत...
डोली मायके से और
अर्थी ससुराल से उठे
इसी भ्रम में
पति और बच्चों के लिए
उपवास रखती है
सबको हरा - भरा कर
खुद को खोखला करती है
चादर के गुदली में
सिमटी औरत
खुद के लिए भी
कभी जीती है क्या ?
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