बलिया को नदिया पार कराने वाले केशव प्रसाद मिश्र

 



विवाह में अकसर बजने वाले गीत जब तक पूरे ना हो फेरे सात.... एवं आज भी होली में 'जोगी जी धीरे-धीरे... बिना इन गीतों के बिना जैसे सूना सा लगता है। जबकि सच्चाई भी यही है कि 'नदिया के पार' के ये गीत ही लोगों के दिलों पर राज नहीं करते, इस फ़िल्म को आज भी दिल से सराहा जाता है। भले ही यह फ़िल्म केशव प्रसाद मिश्र द्वारा लिखित उपन्यास 'कोहबर की शर्त' की आधी कहानी है लेकिन यह भी सोचने योग्य है कि आधी कहानी जब इतनी प्रसिद्ध हो सकती है तो पूरी कहानी क्या बयां करती।

केशव प्रसाद मिश्र का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले बलिहार गाँव में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा भी बलिया जिले में ही हुई। उच्च शिक्षा के लिए जब केशव जी ने प्रयागराज के लिए कूच किया तभी से उनका रुझान हिंदी साहित्य की तरफ़ होने लगा था। वरना कहाँ अर्थशास्त्र का छात्र साहित्य की इतनी बारिकीयों को संजीदगी से सबके सामने ला पाते ये वह स्वयं भी नहीं समझ पाए होंगे।

पूर्वांचल के रहन-सहन का शुरू से ही अपनी एक पहचान रही है। चाहे वो फूटेहरी-चोखा हो या होली के पकवान पुआ सबकी अपनी खासियत आज तक बरकरार रही है। इसलिए जब नदिया के पार फ़िल्म आई तो लोगों को अपनी ही रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी सभी बातें उनके हृदय में रच बस गई क्योंकि समान्यतया फिल्मों में काल्पनिक कहानियाँ होती हैं, जबकि इस फ़िल्म के प्रत्येक किरदार का चरित्र स्वाभाविक सा लगता है ।होलिका में जलाये जाने वाले उबटन का महत्व बलिया वाले बखूबी जानते हैं.. क्योंकि ऐसा माना जाता है कि शरीर के सभी रोग उबटन से छुड़ाकर आग में डाल देने से समाप्त हो जाते हैं। और फिर चाहे नई दुल्हन के घर से कनियायी में आने वाले बायना कसार-लड्डू की ही बात क्यों ना हो।

सबसे महत्वपूर्ण बात जिस पर ‘कोहबर की शर्त’ उपन्यास लिखी गई। कोहबर एक प्रकार की वह सजावट है जहाँ दुल्हन के घर में दुल्हन के विवाह रस्म के पूर्व मुहूर्त निकाला जाता है.. उस कमरे के स्थान को भी उसी दिशा से जोड़ा जाता है जिस दिशा से दूल्हे वालों की बारात निकलने वाली होती है। वहाँ कई प्रकार की पहेलियाँ, काव्य, इत्यादि दुल्हन की सहेलियाँ या बहन लिखती है और दूल्हे से या उसके साथ आए सहबाले से पढ़ना-पढ़वाना होता है। विवाह पश्चात् कोहबर में जाते समय दूल्हे की सालियों द्वारा दुआर छेकना भी एक रस्म है और केशव प्रसाद मिश्र ने इसी शीर्षक को अपने उपन्यास का नाम देकर आंचलिक क्षेत्र में एक नया वर्चस्व कायम किया, जिसे आज तक भुलाया नहीं जा सका।

1965 में जब’कोहबर की शर्त’ छप कर आई लोगों में यह उस रूप में नहीं पहुँची जिस रूप में इसे आनी चाहिए थी। या यह भी कहा जा सकता है कि ‘हम आपके हैं कौन’ फ़िल्म में जैसे जूते चुराने की रिवाज़ का प्रचार-प्रसार हुआ वर्तमान समय में यह चलन बन गई.. लेकिन केशव जी ने ‘कोहबर की शर्त’ की उपलब्धि के लिए कोई प्रचार-प्रसार की तरफ़ कोई कदम नहीं उठाया। आलोचकों की नज़र भी जाने क्यों इस तरफ़ नहीं गई..।राजश्री प्रोडक्शन उन दिनों अपनी चुनिंदा फ़िल्म के लिए जाना जाता था और यही ताराचंद बड़जात्या की नज़र इस आदर्श उपन्यास पर पड़ी और उन्होंने इस पर फ़िल्म बनाने का प्रयास 20 वर्ष बाद शुरू की। केशव प्रसाद मिश्र से मिलकर उनकी सहमति ली गई और नदिया के पार का सफ़र शुरू हो गया।

ताराचंद जी ने इस फ़िल्म की शूटिंग भी उसी पृष्ठभूमि पर करने का निश्चय किया और पहुँच गए अपनी टीम के साथ बलिया। केशव जी को भी बुलाया गया बहुत से जाने-माने लोग भी इस शूटिंग को देखने के लिए आतुर थे किंतु कुछ अपरिहार्य कारणों से बलिया जिले के बलिहार गाँव में यह शूटिंग नहीं हो पायी और निर्देशक को जैसी लोकेशन चाहिए थी वह मिली तो जौनपुर के एक गाँव में।फ़िल्म शूट भी हुई और प्रसिद्ध भी। तब जाकर बलिया और बलिहार के लोगों को यह ज्ञात हुआ कि केशव प्रसाद मिश्र कोई अन्य नहीं बल्कि बलिहार गाँव के विश्वनाथ मिश्र के एकलौते सुपुत्र हैं। जो प्रयागराज में कार्यरत हैं और एक लेखकीय व्यक्तित्व के धनी भी।इस खबर ने तहलका मचा दिया। आज के युग में अगर इस तरह की कोई बात होती है तो तुरंत मिडिया में आग पकड़ लेती लेकिन केशव जी तब भी शांत अपने प्रयागराज के निवास स्थान में बैठ लेखन में व्यस्त रहते थे। उनकी और भी 6-7 उपन्यास आए। काली दीवार, देहरी के आर-पार, क्या रोशनी मौत है, महुआ और साँप, गंगाजल इत्यादि को भी लोगों ने पसंद भी किया लेकिन उनका स्वयं का व्यक्तित्व कहीं छुप सा गया।कारण समझ नहीं आता। आज जब हम धर्मवीर भारती आदि की बातें करते हैं तो उनके सभी साहित्यिक रचनाओं का संसार मिडिया में मिल जाता है लेकिन केशव जी के सिर्फ़ दो ही धरोहर सबके सामने आ पाते हैं.. कोहबर की शर्त और उस रात के बात जो हाल ही में प्रकाशित हुई।

आज अगर गूगल पर खोजा जाए तो केशव प्रसाद मिश्र बलिया वाले के बारे में बड़ी संक्षिप्त जानकारी मिलती है जबकि काशी के संस्कृत आचार्य केशव प्रसाद मिश्र से मिक्स करती हुई भ्रमित करने वाली आधी अधूरी जानकारी मिलती है।क्या ऐसे साहित्यिक व्यक्तित्व का यूँ ही गायब हो जाना अस्वभाविक नहीं लगता जहाँ एक छोटी से छोटी वस्तु का विस्तार गूगल और डिजिटल लाइब्रेरी के जरिये करने के दावे किये जाते हो।


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