स्त्री धन कहाँ तक महिलाओं की ताकत



 

स्त्री धन वह संपत्ति है जिस पर एक स्त्री का पूर्ण अधिकार होता है एवं वह उसका पूर्ण रुप से जब चाहे उपभोग कर सकती है।ऐसी मान्यता है कि वैदिक युग से ही विवाह में उसे दिए जाने वाले उपहार में वस्त्र-आभूषण आदि से स्त्रीधन शब्द की उत्पत्ति हुई। जब कन्या अपने आत्मीय जनों से दूर एक अनजान व्यक्ति के परिवार में प्रवेश करती थी तो उसे इस स्त्रीधन के माध्यम से सुरक्षित महसूस कराया जाता था। इसीलिए पिता पक्ष और ससुराल पक्ष दोनों तरफ़ से जो भी उसे उपहार दिए जाते थे कन्या का ही उस पर पूर्ण अधिकार होता था। किंतु कुछ व्यवस्थाकारों ने इस स्त्री संपत्ति को स्वयं के लिए भी सुरक्षित रखने के लिए ऐसे नियम बनाए कि स्त्रीधन पर सिर्फ़ स्त्री ही नहीं बल्कि उसके पति का भी अधिकार बना रहे। धीरे-धीरे जो धन स्त्री की सुरक्षा से शुरू हुई थीं उसे समाज ने अपनी आन-बान और अपनी इज्जत का नाम देकर दहेज़ जैसी कुप्रथा से जोड़ दिया। वर्तमान युग में कई महिलाएं इस दहेज़ जैसी कुप्रथा का शिकार होती चली आ रही हैं। कहने के लिए स्त्री 21 वीं सदी में चाँद पर जा रही, हवाई जहाज उड़ा रही डॉक्टर, कलक्टर बन रही लेकिन इसी युग में ऐसी भी स्त्री है जिसे ससुराल में कई समस्याओं का सामना करने और सुलझाते सुलझाते अपने अस्तित्व को भी खो दें रही हैं।

 स्त्रीधन की एक विशेषता यह रही है कि गौतम के काल से आजतक यह प्रथमतः स्त्रियों को ही प्राप्त होता रहा है। धर्मशास्त्र - ग्रंथों में सबसे पुरानी परिभाषा मनु की है - विवाह के समय अग्नि के समक्ष जो कुछ दिया गया, विदाई के समय जो कुछ दिया गया, स्नेह वश जो कुछ दिया गया, जो कुछ भ्राता, माता या पिता से प्राप्त हुआ यही धन स्त्रीधन है।

वर्तमान हिन्दू विधि में तो स्त्रीधन  को एक अलग ही सूची में जोड़ा दिया गया है, जिसे दिखावे का नाम देकर सामाजिक रुप में दहेज़ से जोड़ा जाने लगा है।

जबकि स्त्रीधन और दहेज़ में भी अंतर स्पष्ट किया जाने लगा है.. स्त्री के लिए जो ज़ेवर पिता या ससुराल पक्ष से प्राप्त होते हैं उनपर स्त्री का ही पूर्णतया अधिकार माना जाता है, किंतु दहेज़ की बात अगर कहीं जाए तो वधू पक्ष से दिए जाने वाले सामान जो बेड, अलमारी, टी. वी एवं उसके द्वारा प्रयोग की जाने वाली वस्तुएँ वर पक्ष को भेंट स्वरुप दिया जाता है किंतु अब इन चीजों में कैश का भी समीकरण होने लगा और इनमें होने वाली कमी के करण रिश्ते भी टूटते हैं, या फिर लड़कियों को इनके लिए प्रताड़ित किया जाता है।स्त्रीधन को बहुत से स्मृतिकारों ने परिभाषित भी किया है जिसमें से मैं कुछ पर प्रकाश डालने का प्रयास कर रही हूँ -


मनु के अनुसार, "अध्याग्नि वैवाहिक आदमी के समक्ष दिया गया, ( अव्यावहारिक है (वधू के जाने के समय दिया गया) स्तम प्रीति कर्मणी (प्रेम में दिया गया) तथा पिता, माता एवं भाई के द्वारा दिया गया छः प्रकरा का  उपहार स्त्री-धन की कोटि में रखा गया है।

विष्णु के अनुसार, "किसी स्त्री को उसके पिता, माता , पुत्रों अथवा भ्राता द्वारा जो प्राप्त हुआ है जो उसे अध्याग्नि में प्राप्त है जो वह अपने पति द्वारा पुनर्विवाह करने पर उससे प्राप्त करती है, जो उसको उसके सम्बन्धियों द्वारा दिया गया है. उसके शुल्क तथा विवाहोपरांत प्राप्त उपहार स्त्री धन कहा गया है।"

 याज्ञवल्क्य कहते हैं कि "किसं स्त्री को अपने माता-पिता अथवा भाई द्वारा जो प्राप्त हुआ है अथवा जो अध्याग्नि द्वारा प्राप्त होता है अथवा अधिवेदनिका मैं प्राप्त उपहार आदि स्त्री की सम्पत्ति कहलाते हैं।"

कौटिल्य ने स्त्री के अधिकारों के साथ स्त्रीधन के वर्णन पर संक्षिप्त प्रकाश डाला है। स्त्रीधन से पहले उनक अधिकारों और व्यवहार का ज्ञान आवश्यक है, क्योंकि विवाह के बन्धन से भी स्त्री के अधिकारों में परिवर्तन आता है। जिसमें धन सम्बन्धी अधिकार भी सम्मिलित हैं।

स्त्री धन और दहेज में अंतर ?

विवाह के समय या विवाह के पश्चात् महिला के माता-पिता के द्वारा वर पक्ष को नगद राशि, सामान आदि दिया जाता है, तो वह दहेज की श्रेणी में आता है। विवाह के समय वर को दिये जाने वाल जेवर, गाड़ी आदि भी दहेज की श्रेणी में आता है, जबकि महिला को विवाह के समय उसके माता-पिता के द्वारा दिया गया सामान या विवाह के पश्चात् वर पक्ष के द्वारा या उसके रिश्तेदारों द्वारा दिये गये उपहार स्त्रीधन की श्रेणी में आता है जिस पर महिला का पूर्ण अधिकार होता है ।

अब जरा यह समझने का प्रयास करते हैं कि यदि स्त्री धन को जब मनीषीयों ने भी स्पष्ट किया हैं तो फिर आखिर समाज को यह क्यों नहीं समझ आता कि स्त्री की अपनी भी कुछ संपत्ति है, उसके भी कुछ मूलभूत अधिकार हैं जिसे स्वयं समाज ने ही निर्धारित किए हैं। स्त्री नौकरी करे या ना करे उसकी स्वयं की सुरक्षा निर्धारित होनी चाहिए।

कुछ दिनों पहले मेरी एक परिचित बाज़ार में मिली बहुत दिनों बाद बातचीत शुरू हुई तो कॉफी शॉप में बैठने का आमंत्रण मैं भी स्वीकार कर ली। चुकी वह मुझे बड़ी बहन का मान देती आई थीं सो बातों ही बातों में पता चला कि पारिवारिक स्थिति कुछ इस हद तक घुटन वाली हो गई कि उनका पति भी उनसे बातचीत नहीं करते। कारण सुनने पर मैं अचंभित रह गई।

कारण कुछ ऐसा था कि सास को किसी बीमारी में ऑपरेशन कराना हैं, ननद और सास मिलकर उनके गहने की मांग कर रहें जिसे बेचकर सास का ऑपरेशन कराया जायेगा। परिचिता का कहना है कि ससुर भी नौकरी करते हैं, पति भी नौकरी करते हैं, देवर भी नौकरी करता है, ससुराल में अच्छी खासी संपत्ति है तो मेरे गहने मैं क्यों दूँ? बात तो उनकी सौ आने सही थी। यह तो सीधी बात थी कि ऐसी कोई स्थिति नहीं कि वह अपना स्त्री धन यूँ ही दें दे। मतलब साफ था कि सास और ननद की मिली भगत थी, परिचिता को असुरक्षित करने की। लेकिन उनके पति भी उनका साथ दे रहें घर से निकलने की बात कह रहें यह क्या था?  फिलहाल मैं उन्हें लड़ने और हार न मानने की सलाह देकर घर वापस आ गई। लेकिन सवाल मन में यह आया कि स्त्री धन आखिर किस लिए है और अगर यह बात न्यायालय तक जाती है तो इसका नतीजा क्या होगा?

स्त्रियों की सुरक्षा का आखिर उत्तरदायित्व कौन लेगा? जब समाज ही नियम बनाए, और समाज ही उसका अनुचित लाभ उठाये तो एक स्त्री अपनी सुरक्षा कहाँ तक और कैसे करे। जब अपने माता-पिता की दी हुई संपत्ति पर भी उसके अधिकार न रहे, अपने ही घर में सुरक्षित न रहे तो किस काम का दुर्गा-पूजा मनाना, और स्त्री को जननी कह पूजना? आखिर एक स्त्री की ताकत कौन बनेगा पिता, भाई, पति, बेटा या वो स्त्री धन जो सिर्फ़ नाम के लिए उसका है ?


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