विशाल तरु

जन्म हुआ जब उसका
फूटी कुछ कोंपलें।
कोपलों से जन्मी कुछ उमंगे,
धारण किया जिसनें
तने का रूप।
वह सोच रहा था,
होगा वह और बडा और बडा।
मन ही मन सोचा था उसने,
होगा वह विशाल तरु।
उष्णता के प्रकोप से,
सींचता हजारों को,
शीतल छाया देता।
लेकिन कुछ लोगों ने,
क्षणिक स्वार्थ सिद्धि के लिये,
काट लिए उसके कुछ तने।
मौन दुखित हो रहा था,
कर रहा था,
अपनी चोट का एहसास।
फिर सोचा भला,
मै क्यों होऊं दुखी?
मुझमें तो है प्रकृति प्रदत्त,
अनवरत विशाल होने की प्रवृति।
मै क्यों होऊं किसी से नाराज?
मुझमें तो है सहने की क्षमता,
हिमपात और बज्रपात का भी प्रहार।।

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