फिरकीपरस्त जेहादी

सरहद के उस पार रहने वालों
अमन की राह तुमको क्यों नही भाति ?
क्या रखा है इस जेहाद में
गौरतलब है इंसानी जज्बातें।
धर्म तो नाम है,
एक खूबसूरत एहसास का,
जो ऊपरवाले की इबादत में झुके।
यह हाथ आगे बढे किसी मजबूर,
बेसहारा को थामने को
क्यों यह किसी के मौत का फरमान बने?
बडी ही मशक्कत से मिलता है यह मानव जीवन
इसे ऊपरवाले की सेवा में दान करें।
क्या लडना इस दो गज जमीन की खातिर,
मर जाओगे तो यह भी नसीब न होगी दफनाने को।
मानो तो यह जमीन हम सबकी है,
न मानो तो किसी की नही,
बस सोचने का अपना-अपना जज्बा है।
इसीलिए कहते है हम,
आओ दोस्ती की रस्म अदा करें,
धर्मयुद्ध नही, दिलों में मुहब्बत के जज्बात पैदा करें।।

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