बचपन

ऐ नादान बचपन!
आ चल फिर लौट चले,
बचपन के गलियारे में।
थक गई हूँ,
समझदारी की दुनिया से।
उलझ गई
नाते-रिश्तेदारों के जमाने में।
अठखेलियां करना चाहतीं,
फिर से
सखी सहेलियों संग
ट्यूबवेल के पनियारे में।
कहा मजा अब वो
खरीद कर
खाने में,
जो मजा आता था
दक्षिण के बगीचे से,
मित्रों संग जामुन-आम
चुराने में।
आह! कितना आनंद था,
नासमझी के जमाने में।
जगह जगह से
ईंटों को चुराना,
गुड्डे गुडियों का घर बनाना,
अब कहा वो मजा है
खुद का घर सजाने में।।



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