दहेज की चिता

वो जल रही थी
तडप-तडपकर
धूँ-धूँ कर
धुआं उठ रहा था
उसके अंगताप से।
जलती रही वह
तिल-तिलकर
नित्य के अत्याचार से।
बहुत रोई
वह हाथ जोड़
गिडगिडाई भी,
पर किसी तक ना पहुंची
उसके रुदन की आवाज
कुछ भी ना शेष रहा
जलकर हो गया सब राख।
शेष थीं तो बस उसकी अस्थियाँ
कराने को सबको पश्चाताप।
क्या बेटी होना
अपराध था उसका ?
जो उसे जला दिया।
कौन बचायेगा
इन बेटियों का अस्तित्व ?
कौन सम्भालेगा मोर्चा
दहेज के खिलाफ।।




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