पथ
साल दर साल बीत गए
मन फिर भी खडा
वहीं उदास
जाने कितनी
सावन की घटाएँ आई
मेघ भी बरसे
फिर भी खाली रहे
सदा मेरे हाथ
सोचती निरन्तर
चलती भी पथ पर
कोई तो हो
जो देता साथ
कली फूल बने
पौधें वृक्ष बने
बस जलता रहा
अकेला धरती पर
बूढ़ा घास
नित्य बढते रहे सब
नये शिखर पर
बस ढूंढती रही
मै खुद को
करती रही
खुद से ही परिहास।।
मन फिर भी खडा
वहीं उदास
जाने कितनी
सावन की घटाएँ आई
मेघ भी बरसे
फिर भी खाली रहे
सदा मेरे हाथ
सोचती निरन्तर
चलती भी पथ पर
कोई तो हो
जो देता साथ
कली फूल बने
पौधें वृक्ष बने
बस जलता रहा
अकेला धरती पर
बूढ़ा घास
नित्य बढते रहे सब
नये शिखर पर
बस ढूंढती रही
मै खुद को
करती रही
खुद से ही परिहास।।
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