आकांक्षाओं का अंत

काश कि ऐसा न होता
स्थिर, निर्विकार, भावशून्य बने
धीरे-धीरे चिंता की अग्नि में
होती जा रही विलीन।
न कोई अतीत न भविष्य
मात्र स्तब्धता और क्षणिक शांति
बीच-बीच मे स्तब्धता को करूणामयी
बना रहे उपस्थितियो के द्विभाषी आंसू
उपस्थित परिवार, झूठी प्रतिष्ठा की जननी
जो कर रहा था, मेरी आशाओं का अंत।
उनके अफसोस और निराशा के संगम से
उपजे दुर्लभ क्रोध की क्रियाएं
जो प्रतीक थे उनके आतंक के
निरन्तर प्रहार जारी था
पत्थर बनने तक मेरे।
चन्द क्षणों के विराम् और
आंसूओं की धाराओं के बीच
शून्य होती गई मेरी आकांक्षाएं
उनके क्रोध भी थमते गये
खूँ बनते गए आंसू
अपनी निराशा पर अविश्वास की छाया देख
सोचने लगे, होने लगे चिंतामग्न
अपनी जिम्मेदारीयों के बोझ से
कैसे परे हो उनके दामन
कौन जानता था, किसकी जीत हुईं
किसी की आशा मरी
आशा की आत्मा बन गई निराशा
लोग चलते बने
मेरी सफलता को,
असफलता की कुंजी
मेरी लाश को दिए।।

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