दहलीज

रेखा के इस पार भी मैं,
रेखा के उस पार भी मैं।
रेखा के इस पार की नारी,
सुंदर, सुघड़ पर बेचारी।
रेखा के उस पार की नारी,
सशक्त,आत्मविश्वास से भारी।
रेखा के इस पार की नारी,
जबान पर ताला,पैरों में बेड़ी भारी।
रेखा के उस पार की नारी,
स्वछंद,सजग,स्वाधिकारों वाली।
रेखा के इस पार की नारी,
पिंजरे में कसमसाती,फड़फड़ाती।
रेखा के उस पार की नारी,
आसमानी स्वप्नों की डोर उडा़ती।
इस पार या उस पार,
अंतर क्या दोनों के जीवन में?
दोनों डरी-सहमी फिरती मारी मारी।
अंधेरे हालातों से जूझती,
समाज से लड़ती।
स्वयं के अस्तित्व की खातिर,
कहाँ सुरक्षित है ,
नवयुग की भारतीय नारी।।







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