कुर्सी

 *कुर्सी*


अहा! रे कुर्सी

जो हो तुझ पर विराज

उससे कैसी सहजता की आस?

इसके सामने बड़े बड़ों की

बोलती हो जाती बंद

जानकार भी हो जाते

लाचार और बेजान,

तेरे पास आँख और कान नहीं

पर ताकत करोड़ सेना वाली

तिकडमबाज़ी ही है तेरा ईमान।

रातों रात ईमान बदल जाते हैं

बेअक्ल भी बन जाते इंसान,

दो पैर वाले मनुष्य के लिए

चार पैरों वाली कुर्सी..

विनम्रता की उम्मीद कहाँ?

दिमागी झोले में

भरा बहुत है स्वाभिमान।


Comments

Popular posts from this blog

स्त्री धन कहाँ तक महिलाओं की ताकत

पिता

बलिया को नदिया पार कराने वाले केशव प्रसाद मिश्र